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9 अगस्त हिंदुस्तान के लिए क्यों है ख़ास? और क्या है काकोरी काण्ड और अगस्त क्रांति का सच, जानें

Lucknow /1, | Publish Date: Aug 9 2017 1:55PM IST Views:435

हिन्दुस्तान पर राज कर चुकी ब्रिटिश हुकूमत ने चाहे जितने क्रांतिकारियों को काला पानी की सजा दी हो लेकिन 9 अगस्त का दिन अंग्रेजों के लिए एक काले दिन की तरह है। 9 अगस्त को काकोरी काण्ड ने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाने के साथ ही साथ भारतीय जनमानस की चेतना को भी झझकोर कर रख दिया था। महात्मा गांधी को लाख अहिंसावादी और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का धुर विरोधी माना जाता हो पर दुसरे विश्व युद्ध के बाद गांधी जी को मजबूरन 'करो या मरो' का नारा देना पड़ा और अहिंसक गांधी जी ने दिन भी चुना 'काकोरी काण्ड दिवस'। 'अगस्त क्रांति दिवस' का 'काकोरी काण्ड' से यह कनेक्शन भले ही हमारी नयी पीढ़ी न जानती हो लेकिन भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलनकारी और अंग्रेजी हुकूमत इसे अच्छी तरह पहचानती है, जिसने ब्रिटिश हुकूमत के जहाज में कील ठोकने का काम किया। 9 अगस्त को जहां गरम दल के नेता श्रद्धांजली देते है वहीं गांधीवादियों के लिए भी आज के दिन का विशेष महत्व है।

आज ही के दिन वर्ष 1925 में -
9 अगस्त 1925 को रेल से ले जाये जा रहे अंग्रेजों के सरकारी खजाने को क्रान्तिकारियों द्वारा लखनऊ के पास काकोरी रेलवे स्टेशन के पास लूट लिया गया था। 'राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी' ने 9 अगस्त 1925 को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी 'आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन' को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी 'पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल' के नेतृत्व में 'अशफाक उल्ला खाँ', 'पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद' के साथ-साथ 6 अन्य सहयोगियों की मदद से डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया गया। पहले तो उसे खोलने की कोशिश की गयी लेकिन जब वह नहीं खुला तो 'अशफाक उल्ला खाँ' ने अपनी बंदूक 'मन्मथनाथ गुप्त' को पकड़ा दी और हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने में जुट गए। 'मन्मथनाथ गुप्त' ने उत्सुकतावश बंदूक का ट्रैगर दबा दिया जिससे छूटी गोली 'अहमद अली' नाम के मुसाफिर को लग गयी और वह मौके पर ही मर गया। शीघ्रतावश चाँदी के सिक्कों व नोटों से भरे चमड़े के थैले व चादरों में बाँधकर वहाँ से भागने में एक चादर वहीं छूट गई। अगले दिन अखबारों के माध्यम से यह खबर पूरे संसार में फैल गयी। ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गम्भीरता से लिया और सी.आई.डी. इंस्पेक्टर 'तसद्दुक हुसैन' के नेतृत्व में स्कॉटलैण्ड की सबसे तेज तर्रार पुलिस को इसकी जाँच का काम सौंप दिया। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के कुल 40 क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया गया जिसमें 'राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी', 'पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल', 'अशफाक उल्ला खाँ' और 'ठाकुर रोशन सिंह' को मृत्यु-दण्ड की सजा सुनायी गयी। इस मुकदमें में 16 अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम 4 वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम काला पानी का दण्ड तक दिया गया था।

आज ही के दिन वर्ष 1942 में -
9 अगस्त 1942 के दिन को 'अगस्त क्रांति दिवस' के रूप में जाना जाता है। दुसरे विश्व युद्ध में समर्थन लेने के बावज़ूद जब अंग्रेज़ भारत को स्वतंत्र करने को तैयार नहीं हुए तो राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' के रूप में आज़ादी की अंतिम जंग का ऐलान कर दिया। यह आंदोलन मुम्बई के जिस पार्क से शुरू हुआ उसे अब 'अगस्त क्रांति मैदान' के नाम से जाना जाता है। 'भारत छोड़ो आंदोलन' का प्रस्ताव पारित होने के बारे में ब्रिटिश हुक़ूमत पहले से ही सतर्क थी जिसके चलते गाँधीजी को अगले ही दिन पुणे के आगा खान पैलेस में क़ैद कर दिया गया। अहमदनगर क़िले में कांग्रेस कार्यकारी समिति के सभी कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर जेल में बंद कर दिया गया। लगभग सभी नेता गिरफ़्तार कर लिए गए लेकिन युवा नेत्री 'अरुणा आसफ अली' गिरफ़्तार नहीं की गई और मुम्बई के गवालिया टैंक मैदान में उन्होंने सन् 1942 में तिरंगा फहराकर गाँधीजी के 'भारत छोड़ो आंदोलन' का शंखनाद कर दिया। इसके बाद देशवासियों में अंग्रेज़ों को भगाने का ऐसा जुनून पैदा हो गया कि कई स्थानों पर बम विस्फोट हुए, सरकारी इमारतों को जला दिया गया, बिजली काट दी गई और परिवहन व संचार सेवाओं को भी ध्वस्त कर दिया गया। जगह-जगह पर हड़ताल की गई। लोगों ने ज़िला प्रशासन को कई जगह पर उखाड़ फेंका। गिरफ़्तार किए गए नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को जेल तोड़कर मुक्त करा लिया गया और वहाँ स्वतंत्र शासन स्थापित कर दिया। एक तरफ दूसरे विश्व युद्ध से अंग्रेज़ों की रीढ़ टूट गई थी तो दूसरी तरफ 'भारत छोड़ो आंदोलन' ने ब्रिटिश हुकूमत की हिला दी थी।


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