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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, एक युग जिसकी नींव शांति निकेतन में पड़ गयी थी

Lucknow /7, | Publish Date: Aug 19 2017 1:51PM IST Views:708

आचार्य हजारी प्रसाद द्बिवेदी का जन्म 19 अगस्त 19०7 में बलिया जिले के दुबे छपरा नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम अनमोल द्बिवेदी और माता का नाम ज्योति द्बिवेदी था। संस्कृत से इनकी शिक्षा का प्रारंभ हुआ। इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्होंने काशी हिदू विश्वविद्यालय से ज्योतिष और साहित्य में आचार्य की उपाधि प्राप्त की। 194० में हिदी संस्कृत के अध्यापक के रुप मे शांति निकेतन चले गए थे। इसी दौरान इन्हें रवीन्द्र नाथ टैगोर का सानिध्य मिला और साहित्य के गहन अध्ययन के साथ उसकी रचना प्रारंभ की। अनेकों सम्मान के साथ आचार्य का 19 मई 1979 को देहावसान हो गया। 

हिंदी साहित्य के इस महान पुरोधा का जन्म हिंदीभाषा के पोषण के लिए हुआ था। उन्होंने अपने किशोरावस्था से लेकर अंतिम सांस तक साहित्य की सेवा की। इसका प्रतिफल उन्हें समाज में कई पुरस्कारों के रूप में मिला। सभी के ह्रदय में बसने वाले साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद ने देश को अपनी कर्मभूमि के रूप में चुना। 

सन 1950 ई. में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति के अनुरोध और आमंत्रण पर द्विवेदी जी 'हिन्दी विभाग' के अध्यक्ष और प्रोफ़ेसर होकर वहाँ चले गए। इसके एक वर्ष पूर्व सन् 1949 ई. में लखनऊ विश्वविद्यालय ने उनकी हिन्दी की महत्वपूर्ण सेवा के कारण उन्हें डी. लिट्. की सम्मानित उपाधि प्रदान की थी। सन् 1955 ई. में वे प्रथम 'ऑफ़िशियल लैंग्वेज कमीशन' के सदस्य चुने गये। सन् 1957 ई. में भारत सरकार ने उनकी विद्धत्ता और साहित्यिक सेवाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें 'पद्मभूषण' की उपाधि से अलंकृत किया। 1958 ई. में वे नेशनल बुक ट्रस्ट के सदस्य बनाये गए। द्विवेदी जी कई वर्षों तक काशी नागरी प्रचारिणी सभा के उपसभापति, 'खोज विभाग' के निर्देशक तथा 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' के सम्पादक रहे हैं। सन् 1960 ई. में पंजाब विश्वविद्यालय के कुलपति के आमंत्रण पर वे वहाँ के 'हिन्दी विभाग' के अध्यक्ष और प्रोफ़ेसर होकर चण्डीगढ़ चले गये। सन् 1968 ई. में ये फिर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बुला लिये गए और वहाँ डाइरेक्टर नियुक्त हुए और फिर वहीं हिन्दी के ऐतिहासिक व्याकरण विभाग के निर्देशक नियुक्त हुए। वह काम समाप्त होने पर उत्तर प्रदेश, 'हिन्दी ग्रन्थ अकादमी' के अध्यक्ष हुए

बाणभट्ट की संस्कृत में लिखी आत्मकथा को उन्होंने हिंदी में लिखा। इसके बाद चारू चंद, पुनर्नवा आदि सभी इसी शैली में लिखे। इसके अलावा उन्होंने निबंध में भी महत्वपूर्ण प्रयोग किया। हिंदी साहित्य के लिए यह एकदम नया और रोमांचकारी प्रयोग माना गया। वरिष्ठ साहित्यकार ने बताया कि आचार्य की इस शैली की विशेषता यह थी कि निबंध को एक नए ढ़ंग में लिखा जाने लगा। इसके अंतर्गत आसपास की घटनाओं को अर्थात आंखों देखा वर्णन के साथ लोक कथा को शामिल करते हुए लिखा जाने लगा। उन्होंने बताया कि निबंध गंभीरता के पुट लेकर लिखे जाते हैं। इसलिए यह भारी हो जाते हैं। इनसे बचने के लिए यह प्रयोग काफी सराहा गया। क्योंकि इससे रोचकता बढ़ती चली जाती है और पाठक को साहित्य से मोह भंग नहीं हो पाता है। 


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