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एसिड अटैक : एक अविश्वनीय और अकाल्पनिक सच

Lucknow /7, | Publish Date: Jun 21 2017 8:25PM IST Views:550

हिमांशु मिश्रा (पत्रिका लाइव ब्यूरो)

एसिड अटैक से आप सभी लोग अनजान तो नही होंगे। इन हमलों से न सिर्फ महिलायें बल्कि हर वो इंसान जो इंसानियत का भाव रखता है की अंतरात्मा को झटका लगाता है। अपना चेहरा सभी को पसंद होता है और उसे खूबसूरत बनाने के लिए लोग क्या-क्या नही करते है। करें भी क्यों ना आखिर ये हमारी पहचान भी है। अब ये सब जानते हुए अपने विकृत चेहरे के साथ जीवन व्यापन करना किसी के लिए भी आसन नही हो सकता। जिन लोगों के साथ ये हादसे हुए है उनकी भयावह कहानियाँ शायद आपकी आँखे नम कर दे लेकिन वो लोग जिस प्रकार के दर्द को झेलते है उसकी कल्पना करना ही बहुत मुस्किल है।

एसिड हमलों के बढ़ते ग्राफ को देखकर वर्ष 2013 में भारतीय दंड संहिता की धारा 326 ए और 326 बी के तहत पहली बार संशोधित किया गया। जिसके तहत अपराधी के खिलाफ सख्त कायवाही करते हुए कैद और जुर्माने की व्यवस्था की गई। जुर्माने को पीड़ित के इलाज़ में व्यय करने का प्रावधान भी बनाया गया। संसोधन से पहले एसिड हमले में सिर्फ महिलाओं के लिए हिंसा के रूप में मुकदमा चलाया जाता था। एसिड हमलों में पीड़ितों की बात करे तो इनमें 85% महिलाएं शामिल हैं, इसलिए एसिड हमले को भारी रूप से लिंग हिंसा के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। जबकि गैर-परामर्श क्रोध और हताशा इन अपराधों के पीछे का मुख्य कारण माना जा सकता है।

एसिड सरवाइवर फाउंडेशन इंडिया द्वारा प्रकाशित भारत की पूर्व रिपोर्ट में एसिड हिंसा के स्थिति संबंधी विश्लेषण में बताया गया कि 2010 से लेकर 2014 तक दर्ज मामलों में केवल 60% आरोप पत्र दाखिल हुए जिसके परिणामस्वरूप 81% अपराधियों को जमानत मिल गई। एएसएफआई के आंकड़ो के मुताबिक 1999 से 2016 तक भारत में एसिड अटैक के 5000 से भी अधिक मामले आधिकारिक तौर पर दर्ज हुए है और वर्तमान वर्ष 2017 में अभी तक 40 से ज्यादा ऐसी घटनाएँ घट चुकी है। इन मामलों में अगर सरकारी मुआवजे की बात करे तो उसके तहत 3 लाख रूपए पीड़ित के इलाज़ में देने का कानूनी प्रावधान बना जबकि हमले की गंभीरता के आधार पर सर्जरी के लिए आवश्यक औसत कीमत लगभग 50 लाख है।

इतनी कानून व्यवस्था होने के बाद भी एसिड हमलों का लगातार बढ़ना सरकार और प्रशासन के ऊपर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। क्या सिर्फ अपराधी के खिलाफ मुकदमा चला देना, काफी है? क्या सिर्फ पीड़ित को मुआवजा देना, काफी है? क्या सिर्फ हो रही एसिड अटैक की घटनाओं पर राजनैतिक संवेदना व्यक्त कर देना, काफी है? संवैधानिक द्रष्टि से इतना करना काफी हो सकता है लेकिन व्यवहारिक और सामाजिक द्रष्टि से, समाज में फैले इस हिंसक अपराध के लिया इतना करना काफी नही हो सकता।

एक तरफ जहाँ विकास और परिवर्तन की बड़ी-बड़ी बाते होती है, सबके साथ और सबके विकास की बात होती है। तो वहीँ दूसरी तरफ एसिड अटैक जैसी गंभीर अपराधो को नज़र अंदाज़ किया जाता है। एसिड अटैक के अपराधों को समाज में महिलाओं के ऊपर हो रहे अन्य अत्त्याचार (बलात्कार, घरेलू हिंसा) के समान समझा जा सकता है। आखिरकार ये सवाल जरूर खड़ा होता है, क्यों? क्यों लोग ऐसी घटनाओं को अंजाम देते है? आकड़ों के मुताबिक ज्यादातर मामलो में प्रेमविवाद या बदले की भावना का होना पाया गया है। इन हादसों का शिकार होने वाले लोगों का दर्द समझना या महसूस करना आसान नही है। इन अपराधो के मद्देनज़र सरकार और प्रशासन से अपील है कि हो रहे अपराधों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाए, जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाएँ ना घटित हो सके।


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