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जन्मदिवस विशेष : समाजवाद के संघर्ष में गुज़रा 'छोटे लोहिया' का जीवन, जानें और भी ख़ास बातें

Lucknow /3, | Publish Date: Aug 5 2017 12:31PM IST Views:336

कहते हैं तख्त ताज और निजाम बदलने के बाद लोग भी बदल जाते हैं। पिछले साल आज ही के दिन पूरी राजधानी छोटे लोहिया के जन्मदिन की बधाई देते बैनर पोस्टरों से भरी पड़ी थी और एक आज का दिन है जब समाजवादी पार्टी की सरकार नहीं है और छोटे लोहिया का भी कोई अता-पता नहीं है। नौजवान अखिलेश यादव को राजनीति में लाने के लिए जनेश्वर मिश्र मुलायम सिंह यादव से भिड़ गये थे। जिसके उपरान्त संसद में राजनीति के मुद्दों की बारीक समझ विकसित करने से लेकर देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में क्रांतिरथ के माध्यम से पूरे प्रदेश का दौरा कराने सहित जनता से बेहतर संवाद बनाने के लिए अखिलेश यादव में जरुरी कौशल विकसित करने में उनका अहम योगदान था।

जीवनभर किया समाजवाद के लिए संघर्ष -
एक कार्यक्रम में पूर्व सीए‌म अखिलेश यादव ने कहा था कि, "जनेश्‍वर मिश्र ने जीवन भर समाजवाद के लिए संघर्ष किया। वह मुझसे विशेष लगाव रखते थे।" सभाओं में अखिलेश यादव साफ कहते थे कि, "उन्होंने मेरा नामांकन कराया था। उनकी याद में समाजवादी सरकार ने जनेश्‍वर मिश्र पार्क बनाया गया है। जनेश्वर मिश्र हम समाजवादियों के आदर्श हैं। उन्होंने हमेशा किसानों और गरीबों को हित में काम किया। समाजवादी पार्टी उन्ही के रास्ते पर चल रही है।" 

'छोटे लोहिया' के नाम से थे प्रसिद्ध -
समाजवादी विचारधारा के प्रति उनके दृढ निष्ठा के कारण वे 'छोटे लोहिया' के नाम से प्रसिद्ध थे। वे कई बार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्होने मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, एच डी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुज़राल के मंत्रिमण्डलों में काम किया। सात बार केन्द्रीय मंत्री रहने के बाद भी उनके पास न अपनी गाड़ी थी और न ही बंगला।

पिता रंजीत मिश्र थे एक किसान - 
5 अगस्त 1933 को बलिया के शुभनथहीं गांव में जनेश्वर मिश्र ने जन्म लिया था। उनके पिता रंजीत मिश्र किसान थे। बलिया में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद 1953 में इलाहाबाद पहुंचे जो उनका कार्यक्षेत्र रहा। राष्ट्रीय राजनीति के सवालों पर संकट के समय वो पूरी मजबूती के साथ सपा सरकार को समर्थन देते थे, लेकिन सरकारी नीतियों के आधार पर बंदरबांट की दूषित संस्कृति के खिलाफ सरकार को घेरने में कोई कसर नही छोड़ते थे।

बड़ी बात है ऐसा व्यक्तित्व होना -
इलाहाबाद में छात्र आन्दोलन से निकलकर जीवनपर्यंत लोहिया के समाजवाद को चिंतन-चरित्र में आत्मसात करने वाला व्यक्तित्व आजादी बाद देश के राजनैतिक इतिहास में दूसरा मिलना दुर्लभ ही है। एक बार बजट सत्र के बहस में उन्होंने कूड़ा बीनने वालों के पुनर्वास, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए किसी प्रकार की नीति के न होने पर गहरा दुःख प्रकट करते हुए लोकतंत्र के खोखले चरित्र जिसके अंतर्गत वाजिब लोगों को हक न मिलने को उजागर किया था। इसी क्रम में उन्होंने किसानों के लिए सस्ते कैंटीन व्यवस्था को अमली जामा पहनाने की वकालत की थी। जिससे किसान आत्महत्या की दर में कमी आने के साथ इस समस्या को समाप्त किया जा सके। 

सेकुलर प्रवृत्ति के व्यक्ति -
जाति-धर्म की तमाम विसंगतियों से आजीवन स्वयं को बचाने में पूरी तरह सफल भी रहे। पीड़ितों, गरीबों, मजलूमों सहित महिला और अल्पसंख्यकों के प्रति उनका खुला समर्थन था। संघर्ष के बल पर अपनी पहचान बनाने के लिए वो लगातार प्रेरित और प्रशिक्षित रहते थे। राजनैतिक कार्यकर्ताओं के टूटे मनोबल को जोड़ने और उन्हें हर हाल में डटे रहने का संबल प्रदान करने में उनका कोई जोड़ नही था। वो सच्चे सेकुलर प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। 


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