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नफरत की आग में जलता कश्मीर, आखिर दोषी कौन?

Lucknow /7, | Publish Date: Jul 24 2017 1:43PM IST Views:463

हिमांशु मिश्रा (पत्रिका लाइव ब्यूरो)

'कश्मीर में रहना है तो अल्लाह-अकबर कहना है', 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान पंडित आदमियों के बगैर लेकिन पंडित औरतों के साथ' ऐसे कई नारे मस्जिदों और सड़कों' पर बार-बार लगाये गए, पंडितों के घरों की दीवारों पर कश्मीर छोड़ने के लिए पोस्टर तक लगाये गए। ये मंजर था 4 जनवरी ​1990 का, जिस वक़्त कश्मीर में रहने वाले पंडितों के पास सिर्फ तीन रास्ते बचे थे जिसमें पहला था 'कश्मीर से पलायन' दूसरा 'इस्लाम धर्म में परिवर्तन' या फिर तीसरा 'मौत'। उस वक़्त कश्मीर में वेश भूषा और सिनेमा जैसी चीज़ों पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। कश्मीर में रहने वाले हिंदुओं की दुकानों, मकानों आदि को चिन्हित कर दिए गया और उन्हें हर संभव तरीके से कश्मीर छोड़ने पर मजबूर किया गया। 

कई हिंदू नेताओं ने गवाई अपनी जान - 
घाटी में कश्मीरी पंडितों के बुरे दिनों की शुरुआत तो 14 सितंबर 1989 से हो गई थी। जिसके तहत भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और वकील कश्मीरी पंडित 'तिलक लाल तप्लू' की हत्या जेकेएलएफ ने कर दी। इसके बाद जस्टिस नील कांत गंजू की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस समय के अधिकतर हिंदू नेताओं और 300 से अधिक हिंदू पुरुषों और महिलाओँ की आतंकियों द्वारा हत्या की गई थी। सिर्फ इतना ही नहीं उस वक़्त घाटी में कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण की ख़बरें भी आम हो चुकी थी। 

कट्टरपंथियों और आतंकियों के जारी फरमानों की दहशत - 
कश्मीर में हिन्दू होना एक गाली बन गई थी। पूरे कश्मीर में दहशत का माहौल बन हुआ था। भारतीय समर्थकों को मुखबिर करार दिया जाता था और उसे मरना जिहाद कहलाता था जोकि मुसलमानों की नज़र में एक पूण्य का काम था। 4 जनवरी ​1990 को हिजबुल मुजाहिदीन ने कश्मीर के उर्दू समाचार पत्रों आफताब और अलसफा के जरिए एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई जिसमे हिंदुओं को कश्मीर छोड़ने का आदेश लिखा हुआ था। साथ ही साथ लोगों के घरों के बाहर भी ऐसे ही संदेश चिपका दिए गए। आतंकियों के जारी फरमान और कट्टरपंथी लोगों के चलते कश्मीर घाटी में अफरा-तफरी मची थी। मंजर कुछ ऐसा हो गया था कि बंदूकधारी आतंकी और कट्टरपंथी खुले आम क़त्ल कर रहे थे और भारत-विरोधी नारे लगा रहे थे जिसे रोकने वाला कोई भी नहीं था। 

ना कोई नियम ना ही कोई कानून -
उस वक़्त फारुख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त हो चुकी थी और 19 जनवरी 1990 को कश्मीर की सत्ता किसी के भी हाथ में नहीं थी। पुलिस और सेना का भी कुछ अता-पता नहीं था। नये गवर्नर जगमोहन भी कश्मीर नहीं पहुंचे थे इन हालातों में हिन्दू समझ चुके थे कि अब जो होगा वो अच्छा तो बिल्कुल भी नहीं होगा क्यूंकि लाखों की संख्या में मुसलमान अपने हाथों में मशाले लेकर सड़कों पर खुले आम घूमकर असामजिक नारे लगा रहे थे। इससे पहले ऐसा मंजर ना पहले कभी लोगो ने देखा-सुना और ना ही महसूस किया था। बताया जाता है हिन्दूओं ने डर की वजह से अपनी बहन-बेटियों को तहखानों में छुपा दिया ताकि उनके साथ किसी प्रकार की अनहोनी ना हो सके। उन्हें ये भी बताया गया कि अगर उन्हें  अपनी आन-बान पर कोई भी खतरा महसूस हो तो बिना समय गवाएं अपने आप को मौत के घाट उतार लें।  

लाखों की संख्या में हुआ पलायन -
कश्मीर में व्यवस्था को बहाल करने के लिये वहां कर्फ्यू भी लगाया गया लेकिन इसके द्वारा आतंकियों को रोकने में नाकाम हासिल हुई। राज्य में कई बार राष्ट्रपति शासन भी लागू किया गया।19 जनवरी की भयानक रात को निराशा और अवसाद से जूझते 3,50,000 कश्मीरी हिन्दुओं ने अपनी जान बचाने के लिये अपने घर, खेती और अपनी जन्मभूमि को छोडकर पलायन कर लिया और जो वहां बचे रह गए उनका या तो धर्म परिवर्तन कर दिया गया या फिर उन्हें बेरहमी से मार दिया गया। कईयों की मौत तो जलवायु के चलते बीमारी से भी हुई।  

जारी रहा मासूमों की हत्याओं का सिलसिला -
- बहुसंख्यक धर्मनिरपेक्ष भारत में 17 अप्रैल 1998 को उधमपुर जिले के प्रानकोट गाँव में कश्मीरी हिन्दू परिवार के 27 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई।  
- 25 जनवरी 1998 को वंधामा में पुलिस की वर्दी में आए आतंकियों ने 27 लोगो को मार डाला। 
- 20 मार्च वर्ष 2000 को गुरूद्वारे के सामने होली मानाते 36 सिक्खों की गोली मारकर हत्या कर दी। 
- वर्ष 2001 में सेना के भेष में जम्मू कश्मीर रेलवे स्टेशन पर 11 बेगुनाह लोगों की गोली मारकर निर्मम हत्या कर दी गई। 
- वर्ष 2002 में क्वासिम नगर में आतंकियों ने गोलीबारी और ग्रेनेड के जरिए लगभग 29 हिन्दु मजदूरों को मार डाला था।  
- 2003 में पुलवामा जिले के नदिमार्ग गाँव में आतंकियों ने 24 हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया।   
- वर्ष 2006 में डोडा जिले के दो अलग-अलग गाँवों में 35 हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया गया।  
     इसके अलावा ऐसे जाने कितने लोगों की बेवजह ही हत्या कर दी गई जिनके खिलाफ कोई सबूत तक न मिले ना ही कभी कोई कार्यवाही हुई। कश्मीर की ज्वाला में जलने बेगुनाह लोगों का दोषी आखिर कौन है? कश्मीर में फैली नफरत का आखिरकार क्या इलाज़ है? ऐसे जानें कितने ही सवाल लोगों के मन में दबे हुए है लेकिन उसका जवाब देना किसी के बस की बात नहीं बची है।   

मिलकर निकालना होगा कश्मीर मुद्दे का हल - 
कश्मीर मुद्दे पर आए दिन कुछ न कुछ विवाद होता रहता है जिसके चलते वहां के हालात आज भी सुधर नहीं पाए है। आतंकियों और कट्टरपंथी लोगों की पिछड़ी और घटिया सोच घाटी के माहौल को कभी भी सही नहीं रहने दे सकते, वो हमेशा वहां की शांति और अमन को भंग करने की कोशिश करते रहेंगे। कश्मीर मुद्दे में सफलता के लिए हमें पहले आंतरिक सहमती कायम करनी होगी जिसके लिए सभी राजनीतिक दलों को एक साथ आना होगा और सर्वसहमति से ठोस कदम उठाना होगा। कश्मीर हिंदुस्तान का ताज है और इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। 


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