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आज है शायर और गीतकार 'शकील बदायूंनी' का जन्मदिवस, जानें उनसे जुड़ी कुछ ख़ास बाते..

Lucknow /10, | Publish Date: Aug 3 2017 12:02PM IST Views:428

नवाबों की नगरी राजधानी लखनऊ का ज़िक्र आते ही 1960 में गुरुदत्त फिलम्स के बैनर तले बनी फ़िल्म 'चौदहवीं का चांद' का एक गीत बरबस याद आ जाता है, जो लखनऊ की तहज़ीब पर लिखा गया था। मशहूर शायर 'शकील बदायूंनी' के लिखे इस गीत को मुहम्मद रफ़ी साहब ने गाया था, जिसके बोल हैं - ये लखनऊ की सरज़मीं, ये लखनऊ की सरज़मीं। तहजीब के शहर लखनऊ ने फ़िल्म जगत को कई हस्तियां दी है जिनमें से एक रूमानी गीतकार शकील बदायूँनी भी है।

लखनऊ से अलग लगाव -
उत्तर प्रदेश के बदायूँ में 3 अगस्त 1916 को जन्मे शकील अहमद उर्फ शकील बदायूँनी का लालन पालन और शिक्षा नवाबों के शहर लखनऊ में हुई। लखनऊ ने उन्हें एक शायर के रूप में शकील अहमद से शकील बदायूँनी बना दिया। अपने दूर के एक रिश्तेदार और उस जमाने के मशहूर शायर जिया उल कादिरी से शकील बदायूँनी ने शायरी के गुर सीखे। शकील बदायूँनी ने अपनी शायरी में ज़िंदगी की हकीकत को बयाँ किया। उन्होंने ऐसे गीतों की रचना की जो ज्यादा रोमांटिक नहीं होते हुये भी दिल की गहराइयों को छू जाते थे।

तीन दशक में 90 फ़िल्मों के लिये लिखे गीत -
शकील बदायूँनी ने क़रीब तीन दशक के फ़िल्मी जीवन में लगभग 90 फ़िल्मों के लिये गीत लिखे। उनके फ़िल्मी सफर पर एक नजर डालने से पता चलता है कि उन्होंने सबसे ज्यादा फ़िल्में संगीतकार नौशाद के साथ ही की। वर्ष 1947 में अपनी पहली ही फ़िल्म दर्द के गीत 'अफ़साना लिख रही हूँ...' की अपार सफलता से शकील बदायूँनी कामयाबी के शिखर पर जा बैठे।

शकील के लिखे कुछ मशहूर नगमें -
- अफ़साना लिख रही हूँ... (दर्द)
- चौदहवीं का चांद हो या आफ़ताब हो... (चौदहवीं का चांद)
- जरा नज़रों से कह दो जी निशाना चूक न जाये.. (बीस साल बाद, 1962)
- नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं... (सन ऑफ़ इंडिया)
- गाये जा गीत मिलन के.. (मेला)
- सुहानी रात ढल चुकी.. (दुलारी)
- ओ दुनिया के रखवाले.. (बैजू बावरा)
- दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पडे़गा (मदर इंडिया)
- दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात.. (कोहिनूर)
- प्यार किया तो डरना क्या...(मुग़ले आज़म)
- ना जाओ सइयां छुड़ा के बहियां.. (साहब बीबी और ग़ुलाम, 1962)
- नैन लड़ जइहें तो मन वा मा कसक होइबे करी.. (गंगा जमुना)
- दिल लगाकर हम ये समझे ज़िंदगी क्या चीज़ है.. (ज़िंदगी और मौत, 1965)


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