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न्याय व्यवस्था की चरमराती हालत का दोषी कौन?

Lucknow /7, | Publish Date: Jun 23 2017 10:36PM IST Views:457

हिमांशु मिश्रा (पत्रिका लाइव ब्यूरो)

न्यायिक व्यवस्था का एक भयावह परिदृश्य आज हम देश में देख सकते है। एक तरफ जहाँ दिन-पर-दिन अपराधों की संख्या बढती जा रही है तो वहीँ दूसरी तरफ मुकदमों के बोझ से न्याय व्यवस्था ने अपने घुटनें जमीन पर टेक दिए है। कोई भी अपराध घटित होता है तो अपराधी जमानत पर बाहर घूमता है और मुकदमा दायर करने वाला अदालत और वकीलों के चक्कर काट-काट कर थक जाता है। ये सब देखने के बाद, क्या आम जनता न्यायिक तंत्र से न्याय की उम्मीद कर सकती है? शायद नहीं; क्यूंकि आजकल न्याय व्यवस्था की अच्छी छाप सिर्फ टेलीविज़न तक ही सीमित रह गई है, वास्तविकता से इसका कोई संबंध दिखाई नही पड़ता। इस बात की गवाही वर्तमान के हालत दे रहे है। आखिर न्याय व्यवस्था की इस लाचार हालत के लिए कौन जिम्मेदार है?

भारत में न्याय व्यवस्था की हालत कितनी जर्जर है, इसका अंदाजा लगाने के लिए यह एक आंकड़ा ही काफी है। आप को शायद यह जानकर हैरानी होगी कि भारत की निचली अदालतों में पांच हजार जजों की कमी है, जो की न्याय व्यवस्था की एक बहुत बड़ी कमी को दर्शाता है। ध्यान से देखे तो निचली अदालतें किसी भी देश में न्याय व्यवस्था की रीढ़ होती हैं और जब वहां हालत सही नहीं होंगे तो देश में न्यायिक व्यवस्था कैसे सही ढंग से चल पायेगी? सिर्फ इतना ही नहीं देश में सुप्रीम कोर्ट और 24 हाई कोर्ट्स की हालत भी अच्छी नहीं कही जा सकती, क्यूंकि वहां भी जजों की कमी की बात होती रहती है। जजों की कमी से जूझते राज्यों की बात करें तो उसमें सबसे ऊपर गुजरात का नाम आता है, उसके बाद बिहार और उत्तर प्रदेश का नंबर है। इनमें से प्रत्येक राज्य में 500 से भी अधिक जजों की आवश्यकता है। आंकड़ो की बात करे तो 2005 में 72 लाख 54 हजार 145 सिविल मुकदमे लंबित थे जोकि 2015 में बढ़कर 84 लाख 5 हजार 647 हो गए। वहीं जजों की बात करें तो 2005 में जिला और सत्र न्यायालयों में 11 हजार 682 जज थे जबकि 2015 में इनकी संख्या बढ़कर 16 हजार 70 हो गई। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारा न्यायिक तंत्र कितना सुस्त है जो कि जजों की संख्या बढ़ने के बाद भी लंबित मुकदमों में कमी नही ला पाया। आखिर न्यायिक व्यवस्था को दुरुस्त क्यों नही किया जा रहा है?

चलिए अब बात करते है तथ्यों की, कुछ मुकदमें ऐसे हैं जो आज भी रहस्य बने हुए है जैसे- सुनंदा पुष्कर मर्डर केस, शीना बोरा मर्डर केस। इसके अलावा कुछ मामले अदालत में ऐसे भी हैं जो कई सालों तक चलने के बाद भी अभी तक सुलझाए नही जा सके है और जिनका हल निकलना आसन काम नही है जैसे- अयोध्या केस। लेकिन इन सब में कुछ मुकदमे ऐसे भी है जिनका हल तो निकला और अपराधियों को सजा भी मिली लेकिन उनका फैसला आते-आते  कई वर्षो का लम्बा समय लग गया जैसे- दिल्ली रेप केस। ऐसे जाने कितने ही उलझे-सुलझे मुकदमें अदालतों में पड़े है, जिन पर जजों की कमी के कारण सुचारू रूप से कार्यवाही नही हो पाती और फैसला आते-आते वर्षों गुजर जाते हैं।

आज भी जिला अदालतों में लगभग 3 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनमें से आधे सरकारी हैं। विशेषज्ञों की माने तो, समाज में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध, आपराधिक गतिविधियों में लगातार वृद्धि और डामाडोल कानून व्यवस्था के कारण न्यायपालिका के कार्यभार में बढ़ोतरी हुई है जिसके फलस्वरूप आज भी करोडोँ मुकदमे अदालतों में धूल खाती फाइलों के अंदर न्याय की उम्मीद में बंद है। तो क्या हमें मान लेना चाहिए कि भारतीय न्याय व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है और वर्तमान न्यायिक व्यवस्था जनतंत्र का बोझ झेल पाने में असमर्थ है। इन हालातों में एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा होता है कि आखिरकार अब आम आदमी न्याय की तलाश में कहाँ जाए?


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